June 14, 2024
कर्नाटक हिजाब विवाद

सांसदों और विधयकों के खिलाफ करीब 5 हज़ार मामले लंबित, यूपी सबसे ऊपर

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सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया है कि संसद और विधानसभा के वर्तमान और पूर्व सदस्यों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या दिसंबर 2018 में 4110 से बढ़कर दिसंबर 2021 में 4984 हो गई है। न्याय मित्र (एमेक्स क्यूरी) नियुक्त किये गए वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अपनी नई रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इनमें से कुछ मामले तो ऐसे हैं, जो तीन दशकों से भी अधिक समय से लंबित हैं। विधानसभा के वर्तमान सदस्यों के खिलाफ 2324 मामले और विधानसभा के पूर्व सदस्यों के खिलाफ 1675 मामले थे। यहां तक कि1991 मामले तो ऐसे हैं जिनमे अभी तक आरोप भी तय नहीं हुए थे। उच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए स्टे के कारण 264 मामले लंबित हैं।

एमेक्स क्यूरी ने सांसदों और विधानसभा की सुनवाई से जुड़े एक मामले में रिपोर्ट दाखिल की। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य मामलों पर जो वार डेटा उपलब्ध कराता है, उत्तर प्रदेश 1 दिसंबर, 2021 में 1339 लंबित मामलों के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जबकि दिसंबर 2018 तक यहां 992 मामले लंबित थे और अक्टूबर 2020 में, इन मामलों की संख्या 1374 थी। इसलिए आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर 2020 से 1 दिसंबर 2021 के बीच कुछ ही मामलों का निपटारा हुआ है। 4 दिसंबर, 2018 से देखें तो यूपी के 435 मामलों का निपटारा किया गया, जिसमें सेशन कोर्ट ने 364 और मजिस्ट्रेटों ने 71 मामलों का निपटारा किया।

बिहार में दिसंबर 2018 में 304 मामले लंबित थे, जो अक्टूबर 2020 में बढ़कर 557 और दिसंबर 2021 में 571 हो गए। 571 मामलों में से 341 मामले मजिस्ट्रेट अदालतों में और 68 मामले सत्र न्यायालयों में लंबित हैं।

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश की गई। इसमें कहा गया कि माननीय न्यायालय द्वारा कई निर्देशों और निरंतर निगरानी के बावजूद 4984 मामले लंबित थे, जिनमें से 1899 मामले 5 वर्ष से अधिक पुराने थे। गौरतलब है कि दिसंबर 2018 से अब तक 2775 मामले निस्तारित होने के बाद भी संसद और विधानसभा सदस्यों के खिलाफ मामलों की संख्या 4122 से बढ़कर 4984 हो गई है.

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने संसद और विधानसभा के सदस्यों के खिलाफ मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का निर्देश दिया था, और तब से इसने कई निर्देश जारी किए हैं, जिसमें जांच में देरी के कारणों की जांच शामिल है। केंद्र की तरफ से जांच में देरी होने की निगरानी करने के लिए एक कमिटी का गठन किया गया है।

सांसदों के खिलाफ मामलों की संख्या का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दर्शाता है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अधिक से अधिक लोग संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों पर कब्जा कर रहे हैं। इसके लिए तत्काल और कठोर कदम उठाने की जरूरत है। लंबित आपराधिक मामलों का त्वरित निस्तारण किया जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल अगस्त में अदालत ने जांच में देरी के कारणों का विश्लेषण करने के लिए एक निगरानी कमिटी गठित करने का आदेश दिया था जिसके बाद केंद्र ने कोई सलाह नहीं दी थी।